March 1, 2021

ग्राउंड रिपोर्ट बाराबंकी: जिन बच्चों की हुई फिक्र उनकी जिंदगी खिलखिला उठी


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राजधानी लखनऊ से 30 किलोमीटर दूर है जिला बाराबंकी। मुख्यालय से लगभग 15 किलोमीटर आगे बहराइच रोड पर मसौली गांव है। यहां रहने वाले इलियास का 14 महीने का बेटा अब्दुल रहमान जब पैदा हुआ तो उसका वजन दो किलोग्राम था। आंगनबाड़ी कार्यकर्ता रायमा बानो उनके संपर्क में थी। दावा है कि रायमा और परिवार के प्रयासों से अब्दुल रहमान 14 महीने में 7.4 किलोग्राम हो गया है।

इसी गांव की निवासी रन्नो हैं। पांच महीने पहले उन्होंने जुड़वां बेटी-बेटे को जन्म दिया। बिटिया जन्म के समय 1.75 किलोग्राम की थी। जबकि बेटा मात्र 1.9 किलोग्राम का। जन्म से ही कम वजन होने के कारण दोनों को खास देखभाल की जरूरत थी, लेकिन दोनों को ही उनके मां-बाप सरकारी अस्पताल नहीं लेकर गए। कुछ दिन पहले बेटे को बुखार आया और अचानक उसकी मौत हो गई।

रन्नों के जुड़वां बच्चों से पहले तीन बच्चे और हैं। इनमें बेटा शाहिद 15 साल, बेटी नाजिया 13 साल और जाहिद आठ साल का है। चेहरा देखने पर सभी में खून की कमी नजर आती है। 13 साल की नाजिया की तो आंखे पीली हो रही हैं। लेकिन जागरूकता की कमी और दकियानूसी विचारधारा के कारण इलाज नहीं करा रहे। अब्दुल रहमान की तरह ही दो बच्चे और मिले जो जन्म से कुपोषित थे, लेकिन उनके माता-पिता उन्हें कभी सरकारी अस्पताल नहीं ले गए। न ही उन्हें कभी भी पोषण पुनर्वास केंद्र ले जाया गया।

मसौली में ही इब्राहीम अंडा बेचने का काम करते हैं। इनकी बेटी इकरा नौ महीने की है। जब वह पैदा हुई थी तब उसका वजन 1.75 किलोग्राम था। इकरा की मां तो सामने नहीं आई, लेकिन उसकी दादी जरीना ने बताया कि वह अपनी पोती को कहीं लेकर नहीं गई। अगर अस्पताल में भर्ती रहते तो घर कौन संभालता। जरीना ने दावा किया कि धीरे-धीरे इकरा का वजन बढ़ा है।

जयकरनपुर बहरौली गांव को 2012-13 में तत्कालीन डीएम ने गोद लिया था। गलियों में आरसीसी रोड है। सोलर स्ट्रीट लाइट भी हैं। इज्जत घर भी हैं, लेकिन उनकी दशा दयनीय है। यहां कार्य करने वाली आंगनबाड़ी कार्यकर्ता के अनुसार गांव में पांच कुपोषित बच्चे हैं।

शटरिंग का कार्य करने वाले आलमगीर का तीसरा बेटा डेढ़ साल का मो. शारिफ है। घर पर मां मैमुननिशां मिली। गोद में शारिफ को लेकर बाहर निकलती है। देखने में ही उसका वजन कम लगता है। लेकिन इससे मैमुननिशां को कोई फर्क नहीं पड़ता। बताती है कुछ दिन पहले आंगनबाड़ी केंद्र में ही बच्चे का वजन हुआ था। बताया गया कि वजन कुछ कम है। इसके बाद ढाई किलो गेहूं और एक किलो चावल दिया गया। लॉकडाउन के दौरान तीन पैकेट दलिया मिली थी। कुछ बच्चों ने खाई, जो बची वो जानवरों को डाल दी गई।

अतिकुपोषित बच्चों के लिए प्रदेश भर में बने पोषण पुनर्वास केंद्रों में से एक बाराबंकी जिला चिकित्सालय में भी है। दिखने में साफ-सुथरा, दीवारों पर बच्चों को लुभाने वाले चित्र, खाली पड़े बेड और उन पर सफेद चादरें। बच्चे तो यहां भर्ती नहीं मिले लेकिन केयर टेकर अभिषेक कुमार अपनी ड्यूटी पर मौजूद थे। उन्होंने बताया कि दो बच्चे भर्ती थे। 19 दिसंबर 2020 को ही डिस्चार्ज किया गया है।

वहां काउंसलर मंजू सिंह और कुक शालिनी श्रीवास्तव भी थी। शालिनी ने बताया कि कोरोना के कारण बच्चे नहीं आ रहे थे। सात दिसंबर को नटबस्ती से आई शैयदा नाम की बच्ची को भर्ती किया था। 13 दिन भर्ती रखने के बाद उसे डिस्चार्ज कर दिया गया। शैयदा जब भर्ती हुई थी, तब उसका वजन 5.7 किलोग्राम था। डिस्चार्ज के समय वह 7.3 किलोग्राम की हो गई थी।

इसी तरह फतेहपुर ब्लॉक से 10 माह के शिवम को अस्पताल की इमरजेंसी में लाया गया था। उसका भी वजन 5.6 किलोग्राम था। इमरजेंसी से उसे पोषण पुनर्वास केंद्र लाया गया जहां छह दिन रहने के बाद शिवम का वजन 5.85 किलोग्राम हो गया था। लेकिन निमोनिया ठीक न होने के कारण उसे केजीएमयू के लिए रेफर कर दिया गया।

शालिनी बताती हैं कि जनवरी 2020 से 22 दिसंबर तक 29 बच्चे भर्ती हो चुके हैं। इनमें से 15 इसी साल की शुरुआत में जनवरी से मार्च के बीच आए। इसके बाद अप्रैल और मई में एक भी बच्चा नहीं आया। जून से दिसंबर के बीच एक- दो बच्चे भर्ती होते रहे हैं। इस वर्ष अब तक आए 29 बच्चों में से 21 को समय पूरा करने के बाद डिस्चार्ज किया गया। लेकिन आठ ऐसे परिवार थे जो अपने बच्चों को लेकर बिना बताए ही चले गए।

जिला अस्पताल के सीएमएस डॉ.एसके सिंह का कहना है कि ‘कोरोना के कारण बच्चों की भर्ती बंदकर दी गई थी। अब एक बार फिर भर्ती की शुुरुआत हुई है। 14 दिन तक बच्चों को गाइडलाइन के अनुसार भर्ती किया जाता है। बच्चे के साथ रहने वाली उसकी मां के लिए खाने की व्यवस्था की जाती है। डिस्चार्ज के बाद 50 रुपये प्रतिदिन के हिसाब से मां के खाते में भुगतान किया जाता है। बच्चों को चार बार फॉलोअप के लिए भी बुलाया जाता है।’

आंकड़े एक नजर में
कुल बच्चे जिनका वजन और लंबाई नापी गई- 8,781
अतिकुपोषित बच्चे -330
कुपोषित बच्चे  -991

राजधानी लखनऊ से 30 किलोमीटर दूर है जिला बाराबंकी। मुख्यालय से लगभग 15 किलोमीटर आगे बहराइच रोड पर मसौली गांव है। यहां रहने वाले इलियास का 14 महीने का बेटा अब्दुल रहमान जब पैदा हुआ तो उसका वजन दो किलोग्राम था। आंगनबाड़ी कार्यकर्ता रायमा बानो उनके संपर्क में थी। दावा है कि रायमा और परिवार के प्रयासों से अब्दुल रहमान 14 महीने में 7.4 किलोग्राम हो गया है।

इसी गांव की निवासी रन्नो हैं। पांच महीने पहले उन्होंने जुड़वां बेटी-बेटे को जन्म दिया। बिटिया जन्म के समय 1.75 किलोग्राम की थी। जबकि बेटा मात्र 1.9 किलोग्राम का। जन्म से ही कम वजन होने के कारण दोनों को खास देखभाल की जरूरत थी, लेकिन दोनों को ही उनके मां-बाप सरकारी अस्पताल नहीं लेकर गए। कुछ दिन पहले बेटे को बुखार आया और अचानक उसकी मौत हो गई।

रन्नों के जुड़वां बच्चों से पहले तीन बच्चे और हैं। इनमें बेटा शाहिद 15 साल, बेटी नाजिया 13 साल और जाहिद आठ साल का है। चेहरा देखने पर सभी में खून की कमी नजर आती है। 13 साल की नाजिया की तो आंखे पीली हो रही हैं। लेकिन जागरूकता की कमी और दकियानूसी विचारधारा के कारण इलाज नहीं करा रहे। अब्दुल रहमान की तरह ही दो बच्चे और मिले जो जन्म से कुपोषित थे, लेकिन उनके माता-पिता उन्हें कभी सरकारी अस्पताल नहीं ले गए। न ही उन्हें कभी भी पोषण पुनर्वास केंद्र ले जाया गया।



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