March 5, 2021

सरकार से बातचीत के बीच बढ़ रहा किसानों का काफिला, नए साल पर पहुंचे 65 हजार किसान


कड़ाके की सर्दी में धरने पर बैठे किसान हुक्का गुड़गुड़ाते हुए।
– फोटो : फाइल फोटो

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कृषि कानूनों को रद्द करने की मांग को लेकर चल रहा किसानों का आंदोलन लंबा होता जा रहा है और सरकार से लगातार बातचीत के बाद भी कृषि कानूनों को लेकर अभी तक कोई फैसला नहीं हो सका है। हालांकि किसानों व सरकार के बीच थमा बातचीत का सिलसिला दोबारा से शुरू हुआ है, लेकिन उसके बीच ही किसान लगातार आंदोलन को बढ़ाने में लगे है। 

कुंडली बॉर्डर पर शुरुआत में 25 हजार किसानों ने आंदोलन शुरू किया था जो 15 दिन बाद दोगुने हो गए थे। अब फिर अचानक ही किसान बढ़ गए हैं। नए साल पर करीब 65 हजार से ज्यादा किसान दिल्ली बॉर्डर पर पहुंचे है। नया साल मनाने आए किसान अलग है जो बॉर्डर पर एक-दो दिन रहकर लौट जाएंगे। जिस तरह से लगातार बॉर्डर पर किसान पहुंच रहे है, उससे वहां पहले से डटे किसानों व संगठनों के नेताओं का हौसला भी बढ़ रहा है।

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कृषि कानूनों को रद्द कराने की मांग को लेकर किसानों ने 27 नवंबर से नेशनल हाईवे 44 के कुंडली बॉर्डर पर डेरा डाला हुआ है। जहां पहले दिन करीब 25 हजार किसान कुंडली बॉर्डर पर पहुंचे थे। वहीं उसके 15 दिन बाद तक भी काफी किसान पंजाब के साथ ही हरियाणा, यूपी से पहुंचे थे और उससे वहां किसान दोगुने तक हो गए थे। उसके बाद जरूर कुछ कम किसान आ रहे थे और उनमें पंजाब व दिल्ली के किसान ही शामिल थे। यह माना जा रहा था कि ठंड अधिक होने के कारण किसान कम पहुंच रहे हैं, लेकिन अब वहां अचानक ही काफी किसान बढ़ गए हैं। 

चार दिन में करीब 15 हजार किसान बढ़ गए हैं और उनमें सबसे ज्यादा पंजाब के किसान आए है तो दिल्ली व हरियाणा के किसान भी काफी पहुंचे हैं। सरकार से बातचीत शुरू होने के बाद भी जिस तरह से किसान पहुंच रहे हैं और आंदोलन बढ़ रहा है, उससे साफ है कि अगर सरकार से बात नहीं बनती है तो आंदोलन को तेज किया जाएगा। यह जरूर है कि किसान भले ही बढ़े हो, लेकिन इस बार सड़कों पर किसान पूरी तरह से व्यवस्थित है। क्योंकि पहले किसान बढ़ने से आसपास के गांवों का बाहर निकलने तक का रास्ता बंद हो गया था। जिसको लेकर किसान संगठनों के नेताओं से बातचीत के बाद व्यवस्था को ठीक किया गया था। इस बार इसका पूरा ध्यान रखा जा रहा है और व्यवस्था को नहीं बिगड़ने दिया जा रहा है। 

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आंदोलन जिस तरह से बढ़ रहा है, उसका एक कारण यह भी माना जा रहा है कि किसान नेताओं ने कहा है कि उनको सरकार पर ज्यादा विश्वास नहीं है। इसलिए अगर सरकार ने उनकी मांगों को नहीं माना तो आंदोलन को अब पूरी तरह से तेज किया जाएगा। अब यह 4 जनवरी की सरकार व किसानों की बातचीत के बाद ही साफ होगा कि उनमें कोई फैसला होने पर आंदोलन खत्म होगा या समस्या का समाधान नहीं होने पर किसान आंदोलन को तेज करेंगे।

 

कृषि कानूनों को रद्द करने की मांग को लेकर चल रहा किसानों का आंदोलन लंबा होता जा रहा है और सरकार से लगातार बातचीत के बाद भी कृषि कानूनों को लेकर अभी तक कोई फैसला नहीं हो सका है। हालांकि किसानों व सरकार के बीच थमा बातचीत का सिलसिला दोबारा से शुरू हुआ है, लेकिन उसके बीच ही किसान लगातार आंदोलन को बढ़ाने में लगे है। 

कुंडली बॉर्डर पर शुरुआत में 25 हजार किसानों ने आंदोलन शुरू किया था जो 15 दिन बाद दोगुने हो गए थे। अब फिर अचानक ही किसान बढ़ गए हैं। नए साल पर करीब 65 हजार से ज्यादा किसान दिल्ली बॉर्डर पर पहुंचे है। नया साल मनाने आए किसान अलग है जो बॉर्डर पर एक-दो दिन रहकर लौट जाएंगे। जिस तरह से लगातार बॉर्डर पर किसान पहुंच रहे है, उससे वहां पहले से डटे किसानों व संगठनों के नेताओं का हौसला भी बढ़ रहा है।

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कृषि कानूनों को रद्द कराने की मांग को लेकर किसानों ने 27 नवंबर से नेशनल हाईवे 44 के कुंडली बॉर्डर पर डेरा डाला हुआ है। जहां पहले दिन करीब 25 हजार किसान कुंडली बॉर्डर पर पहुंचे थे। वहीं उसके 15 दिन बाद तक भी काफी किसान पंजाब के साथ ही हरियाणा, यूपी से पहुंचे थे और उससे वहां किसान दोगुने तक हो गए थे। उसके बाद जरूर कुछ कम किसान आ रहे थे और उनमें पंजाब व दिल्ली के किसान ही शामिल थे। यह माना जा रहा था कि ठंड अधिक होने के कारण किसान कम पहुंच रहे हैं, लेकिन अब वहां अचानक ही काफी किसान बढ़ गए हैं। 

चार दिन में करीब 15 हजार किसान बढ़ गए हैं और उनमें सबसे ज्यादा पंजाब के किसान आए है तो दिल्ली व हरियाणा के किसान भी काफी पहुंचे हैं। सरकार से बातचीत शुरू होने के बाद भी जिस तरह से किसान पहुंच रहे हैं और आंदोलन बढ़ रहा है, उससे साफ है कि अगर सरकार से बात नहीं बनती है तो आंदोलन को तेज किया जाएगा। यह जरूर है कि किसान भले ही बढ़े हो, लेकिन इस बार सड़कों पर किसान पूरी तरह से व्यवस्थित है। क्योंकि पहले किसान बढ़ने से आसपास के गांवों का बाहर निकलने तक का रास्ता बंद हो गया था। जिसको लेकर किसान संगठनों के नेताओं से बातचीत के बाद व्यवस्था को ठीक किया गया था। इस बार इसका पूरा ध्यान रखा जा रहा है और व्यवस्था को नहीं बिगड़ने दिया जा रहा है। 

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आंदोलन जिस तरह से बढ़ रहा है, उसका एक कारण यह भी माना जा रहा है कि किसान नेताओं ने कहा है कि उनको सरकार पर ज्यादा विश्वास नहीं है। इसलिए अगर सरकार ने उनकी मांगों को नहीं माना तो आंदोलन को अब पूरी तरह से तेज किया जाएगा। अब यह 4 जनवरी की सरकार व किसानों की बातचीत के बाद ही साफ होगा कि उनमें कोई फैसला होने पर आंदोलन खत्म होगा या समस्या का समाधान नहीं होने पर किसान आंदोलन को तेज करेंगे।

यह किसानों का आंदोलन है और किसान अपने हक की लड़ाई के लिए लगातार बॉर्डर पर पहुंच रहे है। किसान पंजाब, हरियाणा, यूपी, दिल्ली, राजस्थान तक से यहां आ रहे है, जिससे किसान लगातार बढ़ते जा रहे है और उससे आंदोलन भी बड़ा होता जा रहा है। सरकार से बातचीत चल जरूर रही है, लेकिन सरकार के पिछले रवैये को देखकर लगता नहीं कि वह मांगों को मानेगी। लेकिन हम सरकार से मांग करते है कि जिस तरह से किसान कड़ाके की ठंड में सड़क पर रह रहे है, उनकी परेशानी को देखते हुए सरकार को एक कदम आगे बढ़ते हुए किसानों की मांग को मानकर कृषि कानून रद्द करने चाहिए।  – गुरनाम सिंह चढूनी, अध्यक्ष, भाकियू, हरियाणा

 

किसान यहां ठंड में कृषि कानून रद्द कराने के लिए सड़क पर बैठे हुए है। सरकार को 4 जनवरी की बैठक में किसानों की सभी मांगों को पूरा करना चाहिए और कृषि कानून को रद्द करना चाहिए। अगर ऐसा नहीं होता है तो किसान आंदोलन को तेज करेंगे और सरकार के लिए परेशानी हो सकती है। बॉर्डर पर किसानों के आने का सिलसिला लगातार जारी है और आंदोलन जितना लंबा होता जाएगा। यहां उतने ही किसान बढ़ते जाएंगे। किसान कृषि कानून रद्द कराए बिना वापस जाने वाले नहीं हैं। – सुखविंदर सिंह, अध्यक्ष, किसान मजदूर संघर्ष कमेटी



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